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PF, ESI और प्रोफ़ेशनल टैक्स की बुनियादी बातें
ज़्यादातर भारतीय सैलरी स्लिप पर चार कटौतियाँ होती हैं: प्रोविडेंट फ़ंड, ESI, प्रोफ़ेशनल टैक्स और TDS। हर एक का अपना नियम है कि कौन इसमें आता है और कितना कटता है। छोटे एम्प्लॉयर के लिए बुनियादी बातें यहाँ हैं।
प्रोविडेंट फ़ंड (PF)
- कौन: 20 या ज़्यादा कर्मचारियों वाले बिज़नेस को EPFO में रजिस्टर होना ज़रूरी है। छोटे बिज़नेस अपनी मर्ज़ी से जुड़ सकते हैं।
- कर्मचारी का हिस्सा: बेसिक + DA का 12%, सैलरी से कटता है।
- एम्प्लॉयर का हिस्सा: और 12%, ऊपर से दिया जाता है। इसमें से 8.33% पेंशन स्कीम में जाता है (₹25,000 तक की सैलरी पर, यानी ज़्यादा से ज़्यादा ₹2,083 महीना) और बाकी PF खाते में। छोटे एडमिन और बीमा चार्ज भी एम्प्लॉयर देता है।
- वेज सीलिंग: कंट्रीब्यूशन बेसिक + DA के ₹25,000 तक सीमित हो सकता है (वेज सीलिंग, 17 सितंबर 2026 को ₹15,000 से बढ़ाई गई)। एम्प्लॉयर पूरी बेसिक पर भी दे सकते हैं। ₹25,000 तक कमाने वाले कर्मचारियों को अब इसमें लाना ज़रूरी है।
- उदाहरण: बेसिक ₹30,000 → ₹25,000 तक सीमित करने पर कर्मचारी का PF ₹3,000, या पूरी बेसिक पर ₹3,600।
ESI (Employees' State Insurance)
- कौन: आमतौर पर उन इलाकों के 10 या ज़्यादा कर्मचारियों वाले बिज़नेस जहाँ ESI लागू है। यह उन कर्मचारियों को कवर करता है जिनकी ग्रॉस सैलरी ₹21,000 महीना या कम है (दिव्यांग व्यक्तियों के लिए ₹25,000)।
- कर्मचारी का हिस्सा: ग्रॉस सैलरी का 0.75%, अगले रुपये तक ऊपर राउंड करके।
- एम्प्लॉयर का हिस्सा: ग्रॉस सैलरी का 3.25%।
- उदाहरण: ग्रॉस ₹18,000 → कर्मचारी का ESI ₹135, एम्प्लॉयर का ESI ₹585।
- बीच में ₹21,000 पार होना: जो कर्मचारी कंट्रीब्यूशन पीरियड (अप्रैल से सितंबर, अक्टूबर से मार्च) की शुरुआत में कवर था, वह बढ़ोतरी के बाद भी पीरियड खत्म होने तक कवर रहता है। तब तक ESI काटते रहें और लाइन हाथ से बदलें; मेकर का बटन सिर्फ़ इस महीने की ग्रॉस देखता है।
प्रोफ़ेशनल टैक्स
रोज़ी-रोटी कमाने पर लगने वाला राज्य का टैक्स। हर राज्य अपने स्लैब तय करता है, और संविधान इसे हर व्यक्ति के लिए सालाना ₹2,500 तक सीमित करता है। कई राज्य ज़्यादा सैलरी पर करीब ₹200 महीना लेते हैं, कभी-कभी सालाना टोटल पूरा करने के लिए एक महीने में ज़्यादा रकम। कुछ राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, जैसे दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश, इसे नहीं लेते। अपने राज्य के अभी के स्लैब जाँच लें, क्योंकि ये बदलते हैं।
सैलरी पर TDS
एम्प्लॉयर कर्मचारी की चुनी रिजीम के हिसाब से उसके साल भर के टैक्स का अंदाज़ा लगाता है, और हर महीने बराबर हिस्सों में काटता है। नई रिजीम (डिफ़ॉल्ट) में करीब ₹12.75 लाख सालाना तक की सैलरी पर स्टैंडर्ड डिडक्शन और रिबेट के बाद आमतौर पर टैक्स नहीं बनता, इसलिए कई छोटे बिज़नेस की स्लिप पर TDS ज़ीरो दिखता है। पुरानी रिजीम में छूटें और HRA की छूट (किराया रसीदों के साथ) आँकड़ा बदल देती हैं। साल खत्म होने के बाद एम्प्लॉयर TDS सर्टिफ़िकेट देता है।
झटपट टेबल
| कटौती | कर्मचारी देता है | एम्प्लॉयर देता है | लिमिट |
|---|---|---|---|
| PF | बेसिक + DA का 12% | 12% | ₹25,000 वेज सीलिंग (ज़्यादा पर भी दे सकते हैं) |
| ESI | ग्रॉस का 0.75% | 3.25% | ग्रॉस ₹21,000 तक |
| प्रोफ़ेशनल टैक्स | राज्य के स्लैब के हिसाब से | कुछ नहीं | सालाना ₹2,500 |
| TDS | टैक्स के अंदाज़े के हिसाब से | कुछ नहीं | इनकम और रिजीम पर निर्भर |